राष्ट्रीय खेल:कितना दूहा नगदी खेल से तेल
*जिया जैदी "झारखण्ड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में राष्ट्रीय खेल ......" इसी वाक्य से शुरू होते थे झारखण्ड सरकार द्वारा टीवी पर विज्ञापन.....या अख़बारों में विज्ञापन.....बेचारे खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष केन्द्रीय मंत्री सुबोध कान्त सहाय, खेल से इतने दरकिनार कर दिए गए कि उनके खास कार्यकर्त्ता भी एक-एक पास के लिए तरस गए.....और सहाय जी को अपने दल के कार्यकर्ताओं के लिए अपनी जेब से रुपए ढीले पाच हजार टिकेट खरीदने पड़े. हकीकत यह है कि सिर्फ सुबोध कान्त ही नहीं बल्कि, भारतीय ओलम्पिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और झारखण्ड ओलम्पिक संघ के अध्यक्ष आर.के .आनद भी दरकिनार कर दिए गए. वस्तुतः अर्जुन मुंडा ने बड़े करीने से सुबोध कान्त सहित सभी विपक्ष के नेताओं को दरकिनार कर दिया, पूरे खेल को हाईजैक कर लिया और वे भौचक देखते रह गए.
खेल की सफलता का सारा श्रेय भी अर्जुन मुंडा ही मार ले गए. और अब विपक्ष हवा में लाठी भंज रहा है. चिड़िया चुग गयी खेत तो अब पछताय हॉट क्या?
आठ से नौ करोड़ रुपए मुम्बई के सीने कलाकारों को खेल की शोभा बढ़ने के लिए बतौर फीस दे दिए गए. उनके लिए होटल में लजीज भोजन परोसे गए. उनके स्वागत में पलक-पांवड़े बिछा दिए गए. सुरक्षा पर भी लाखों का खर्च कर दिया गया. लेकिन, खेल गाँव में जिन कलाकारों ने सर्वाधिक अनूठा मनोरंजन प्रदान किया तो वे झारखंडी कलाकार ही थे. और उनको रूखे-सूखे भोजन पर ही निर्भर रहना पड़ा, न्यूनतम फीस पर घंटों पसीना बहाना पड़ा. उनको फीस प्राप्त करने में भी बहुत मशक्कत करनी पड़ी. खेल गाँव के सफाई मजदूरों को अपनी मेहनत की कमाई पाने के लिए खेल के आखिरी दिन सत्याग्रह करते हुए खेल गाँव का मुख्य द्वार बंद कर देना पड़ा. ढाई - तीन घंटे तक नारेबाजी करनी पड़ी. और कैटरीना कैफ तो सारा माल अडवांस में ले कर ही रांची आई थीं और चाँद मिनटों में अपना जलवा दिखला कर विमान से उड़नछू हो गयीं. यह जांच का विषय है कि सीने कलाकारों ने अपनी फीस का कितना प्रतिशत आमंत्रण देने वालों की जेब में डालने की डील की.
यह कोई पहला मौका नहीं है जब झारखंडी कलाकारों को मजदूर की तरह देखा गया है-घर की मुर्गी दाल बराबर समझा गया है. जब भी यहाँ के सरकारी आयोजन में झारखंडी कलाकारों, कवियों, नाट्य कलाकारों के साथ-साथ मुंबई के कलाकारों को भी आमंत्रित किया जता है तो, दोनों के फ़ूड पैकेटों की दर में आसमान और जमीन का अंतर रहा है. शायद यहाँ के हुक्मरान नहीं चाहते कि झारखंडी कलाकारों को फाइव स्टार होटल के भोजन का स्वाद लग जाए. वे नहीं चाहते कि यहाँ के कलाकार भी उचित फीस की मांग करें.
अभी तक मुंडा सरकार ने इस बात का व्योरा नहीं दिया है कि झारखण्ड की टीम में जिन बाहरी खिलाडियों को जगह दी गयी, उनको कितने में खरीदा गया. अन्दर से आ रही सूचना के हिसाब से उनको इतनी बड़ी राशि दी गयी जो एक रिकार्ड बनाएगी. लेकिन खेल के समाप्त होते ही असली झारखंडी खिलाडियों को भुला दिया गया . जिन असली झारखंडी खिलाडियों ने पदक पाए हैं उनको सरकारी पुरस्कार पाने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ेगी. सम्भावना है कि ६०-४० का खेल उनके साथ खेला जाए.
विधान सभा में राज्यपाल के अभिभाषण के बाद झारखण्ड विकास मोर्चा के प्रदीप यादव और कांग्रेस के के. एन. त्रिपाठी ने राष्ट्रीय खेल पर राज्य सरकार से श्वेत पात्र जारी करने की मांग भी कर डाली है. उनका कहना है कि जब राज्य के कई भाग में सूखा पड़ा हुआ है और लोग भूख से मर रहे हैं तब, करोड़ों रुपए सीने कलाकारों पर क्यों खर्च किए गए. इस खेल के आयोजन में भी करोड़ों की घपलेबाजी की गई है, इसलिए इसकी जाँच अवकाश प्राप्त न्यायाधीश से कराई जाए. सबसे गौर करने वाली बात यह है कि विकास के क्षेत्र में वे काम जिनमें घपलेबाजी की सम्भावना कम होती है, उनके लिए निर्दिष्ट राशि खर्च ही नहीं की जाती है और की भी जाती है तो आंशिक रूप से और बेमन से. लेकिन, खेल समारोहों जैसे कार्यक्रम जिनमें, प्रतिशत का खेल बेहतर चलता है, उन पर निर्धारित या आकलित राशि से अधिक खर्च कर दिया जाता है. कृषि के क्षेत्र में हर वर्ष ६० प्रतिशत राशि राज्य सरकार सरेंडर कर रही है. मतलब यह है की सरकार आम आदमी के विकास से ज्यादा सरकार चलने वाले नेताओं और अफसरों की जेब का ख़याल रखती है. झारखंडी कलाकारों और खिलाडियों को फिलहाल झारखण्ड सरकार ने छउवा (मास्कोट) की तरह बहला फुसला दिया हैं.