मंगलवार, 1 मार्च 2011


राष्ट्रीय खेल:कितना दूहा नगदी खेल  से तेल
*जिया जैदी


"झारखण्ड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में राष्ट्रीय खेल ......" इसी वाक्य से शुरू होते थे झारखण्ड  सरकार द्वारा टीवी पर विज्ञापन.....या अख़बारों में विज्ञापन.....बेचारे खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष केन्द्रीय मंत्री सुबोध कान्त सहाय, खेल से इतने दरकिनार कर दिए  गए कि उनके खास  कार्यकर्त्ता भी  एक-एक पास के लिए तरस गए.....और सहाय जी को अपने दल के कार्यकर्ताओं के लिए अपनी जेब से रुपए ढीले  पाच हजार टिकेट खरीदने पड़े. हकीकत यह  है कि  सिर्फ सुबोध कान्त ही नहीं बल्कि, भारतीय ओलम्पिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और  झारखण्ड ओलम्पिक संघ के अध्यक्ष आर.के .आनद भी दरकिनार कर दिए गए. वस्तुतः अर्जुन मुंडा ने बड़े करीने से सुबोध कान्त सहित सभी विपक्ष के नेताओं को दरकिनार कर दिया, पूरे खेल को हाईजैक कर लिया  और वे भौचक देखते रह गए.
         खेल की  सफलता का  सारा श्रेय भी अर्जुन मुंडा ही मार ले  गए. और अब विपक्ष हवा में  लाठी भंज रहा है. चिड़िया चुग गयी खेत तो अब पछताय हॉट क्या?
        आठ से नौ करोड़ रुपए मुम्बई के सीने कलाकारों को खेल की शोभा  बढ़ने के लिए बतौर फीस दे दिए गए.  उनके लिए होटल में लजीज भोजन परोसे गए. उनके स्वागत में पलक-पांवड़े बिछा दिए गए. सुरक्षा  पर भी लाखों का खर्च कर दिया गया. लेकिन, खेल गाँव में जिन कलाकारों ने सर्वाधिक अनूठा मनोरंजन  प्रदान किया तो वे  झारखंडी  कलाकार ही थे. और उनको रूखे-सूखे भोजन पर ही निर्भर रहना पड़ा, न्यूनतम फीस पर घंटों पसीना बहाना  पड़ा. उनको फीस प्राप्त करने में भी बहुत मशक्कत  करनी पड़ी. खेल गाँव के सफाई मजदूरों को अपनी मेहनत  की कमाई पाने के लिए खेल के आखिरी दिन सत्याग्रह करते हुए खेल गाँव  का मुख्य द्वार बंद कर देना पड़ा. ढाई - तीन  घंटे तक नारेबाजी करनी पड़ी. और कैटरीना  कैफ तो सारा माल अडवांस में ले कर ही रांची आई थीं और चाँद मिनटों में  अपना जलवा दिखला कर विमान से उड़नछू हो गयीं. यह जांच  का विषय है कि सीने कलाकारों ने अपनी फीस का कितना प्रतिशत आमंत्रण देने वालों  की जेब में डालने की डील की.
          यह कोई पहला मौका नहीं है जब   झारखंडी कलाकारों को मजदूर की तरह देखा गया है-घर की  मुर्गी दाल बराबर समझा गया है.  जब भी यहाँ के सरकारी आयोजन में झारखंडी कलाकारों, कवियों, नाट्य कलाकारों के साथ-साथ  मुंबई के कलाकारों को  भी आमंत्रित किया जता है तो, दोनों के फ़ूड पैकेटों की दर में आसमान और जमीन का अंतर रहा  है. शायद यहाँ के हुक्मरान नहीं चाहते कि झारखंडी कलाकारों को फाइव स्टार होटल के भोजन का  स्वाद लग जाए. वे नहीं चाहते कि  यहाँ के कलाकार भी उचित फीस की मांग करें.

           अभी तक मुंडा सरकार ने इस बात का  व्योरा नहीं दिया है कि झारखण्ड  की टीम में जिन बाहरी खिलाडियों को जगह दी गयी, उनको कितने में खरीदा गया. अन्दर से आ रही सूचना के हिसाब से उनको इतनी बड़ी राशि दी गयी जो एक रिकार्ड बनाएगी. लेकिन खेल के समाप्त  होते ही असली  झारखंडी खिलाडियों को  भुला दिया गया . जिन असली झारखंडी खिलाडियों ने पदक पाए  हैं उनको सरकारी पुरस्कार पाने में भी काफी मशक्कत  करनी पड़ेगी. सम्भावना है कि ६०-४० का खेल उनके साथ खेला जाए.

         विधान सभा में  राज्यपाल   के अभिभाषण  के बाद झारखण्ड विकास मोर्चा  के प्रदीप यादव  और कांग्रेस के के. एन. त्रिपाठी ने राष्ट्रीय  खेल पर राज्य सरकार से  श्वेत पात्र जारी करने की मांग भी कर डाली है. उनका कहना है  कि जब राज्य के कई भाग में सूखा पड़ा हुआ है और  लोग भूख से मर रहे हैं तब, करोड़ों रुपए सीने कलाकारों पर क्यों खर्च किए गए. इस खेल के आयोजन में भी करोड़ों की घपलेबाजी की गई है, इसलिए इसकी जाँच अवकाश प्राप्त न्यायाधीश से कराई जाए. सबसे गौर करने वाली बात यह है कि विकास के क्षेत्र में वे काम जिनमें घपलेबाजी की सम्भावना कम होती है, उनके लिए निर्दिष्ट राशि खर्च  ही नहीं की जाती  है और की  भी जाती  है तो आंशिक रूप से और बेमन से. लेकिन, खेल समारोहों जैसे कार्यक्रम जिनमें,  प्रतिशत का खेल बेहतर चलता है, उन पर निर्धारित या आकलित राशि से अधिक खर्च कर दिया जाता है.  कृषि के क्षेत्र में हर वर्ष ६० प्रतिशत राशि राज्य सरकार सरेंडर कर रही है. मतलब यह है की सरकार आम आदमी के विकास से ज्यादा सरकार चलने वाले नेताओं और अफसरों की  जेब का ख़याल रखती है.  झारखंडी कलाकारों और खिलाडियों   को फिलहाल झारखण्ड सरकार ने छउवा   (मास्कोट) की तरह बहला फुसला दिया हैं.

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

रक्त हीन क्रांति १६८८  में एक बाहरी राजकुमार अवाम सेना की सहायता से इंग्लॅण्ड वासियों ने अपना संवैधानिक अधिकार पाया. इस कारण इसका महत्व रहा और इसे राष्ट्रीय क्रांति मना गया. इसी प्रकार मग्नेकार्टा (१२१५) वास्तव में सामंतों द्वारा अपने अधिकारों की  सुरक्षा के लिए प्राप्त किया गया अधिकार मात्र था. इसे अंग्रेजी स्वतंत्रता की आधारशिला और संविधान की बाइबल   मना गया. १७८९ की फ़्रांसिसी क्रांति  सामन्तवादी वर्ग द्वारा राजा की निरंकुशता पर नियंत्रण की कहानी है, पर इसे राष्ट्रीयता और लोकतंत्र का जनक मना जाता है. १७७३ का अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम मातृ    शक्तियों एवं औपनिवेशिक ताकतों में टकराव की कथा है, फिर भी इसका अंतर्राष्ट्रीय महत्व है. ये सारी क्रांतियाँ सफल रहीं, इस कारण इनका महत्व रहा, किन्तु १८५७ की क्रांति असफल रही. असफलता के बावजूद ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता में परिवर्तन, भविष्य के राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रेरक की भूमिका आदि ने १८५७ की क्रांति के स्वरूप को राष्ट्रीय बना दिया.
           सन्दर्भ स्रोत:
१. गिरि राजीव रंजन, १८५७- विरासत से जिरह, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, २०९९, पृष्ठ ६१ 
२. स्ट्रेची जौन, इंडिया-फर्स्ट एडमिनिसट्रेशन   एंड प्रोग्रेस, पीएस  से अयोध्या सिंह कृत भारत का मुक्ति संग्राम से उद्धृत. 
३. सीले जे.आर,दी  इक्सपेनशन  ऑफ़ इंग्लॅण्ड, लन्दन, १८८३, पृष्ठ २८
४. देसाई ए.आर., भारतीय राष्ट्रवाद की सामजिक पृष्ठभूमि, माकमिलन इंडिया लिमिटेड, नई दिल्ली, १९९१, पृष्ट-१
५.  तत्रैव, पृष्ठ-२ 
६.  तत्रैव, पृष्ठ-५
७. सेन एस.एन. १८५७ का स्वतंत्रता संग्राम, अनुवाद इरफ़ान, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, १९९८, पृष्ठ-६८ 
८. सुन्दर लाल, भारत में अंग्रेजी राज, भाग -२,   प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, २०००, पृष्ठ-३०६ 
९.रसेल डब्लू. एच., माई डायरी इन इंडिया इन द   ईयर आफ १८५८-५९, लन्दन, १९०५, पृष्ठ-१६४
१०. मैकार्थी जस्टिन, हिस्ट्री ऑफ़ ओन टाइम्स, वोल्यूम -तीन  से हरदास बाल शास्त्री  की आर्म्ड स्ट्रगल फॉर फ्रीडम १८५७-१९४७, काल प्रकाशन,पूने, १९५८, पृष्ठ-१३-१४, पर उद्धृत 
११. नेहरू जे.एल. द डिस्कवरी ऑफ इंडिया, द शीनेस्त प्रेस, कोलकाता, १९३६, पृष्ठ-२७९
१२. सावरकर बी.डी., द इंडियन वार ऑफ इन्देपेंदेंस, फ़ोन निवास, पब्लिकाशन, मुम्बई, १९४७, पृष्ठ-८ 
१३. शुक्ल आर.एल., आधुनिक भारत का इतिहास, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, नई दिल्ली, २००१, पृष्ठ-२४०
१४. १५. और १६. हंस ईड़, तृतीय सेरिज,ई.एक्स.एल.४,जून-जूली, १८५७ से मित्तल एस.सी. कृत, १८५७ का स्वतंत्रता समर-एक पुनरवलोकन, भारतीय इतिहास समिति, नई दिल्ली, २००० के पृष्ठ-६-७ पर उद्धृत 
१७.ट्रेविलियन गी.ओ. द लाइफ एंड लेटर्स ऑफ लॉर्ड मेकाले, पार्ट सेकेण्ड, लन्दन, १८७६, पृष्ठ-४४७
१८. जौन अर्नेस्ट, ५ सितम्बर १८५७, पीपुल्स पेपर  ऑन-इंडियन स्ट्रगल
१९. मार्क्स, द फर्स्ट इंडियन वार इनडेपेनडेंस , विदेशी भाषा प्रकाशन समूह, मास्को, १८५७-५९, पृष्ठ-४१-४२
२०. सुन्दरलाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३१७
२१. विल्सन जे.सी., कम्प्लीट हिस्ट्री और द ग्रेट सिपाही वार, पृष्ठ-१७ से  सुन्दरलाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३१३ 
२२. अयोध्या सिंह, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३०८-३०९ 
२३.  सुन्दरलाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३१२
२४. सेन सुरेन्द्रनाथ, पूर्वोक्त, पृष्ठ-६६
२५. सुन्दरलाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३१२ 
२६. सुन्दरलाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३१३ 
२७.  सुन्दरलाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३१३ 
२८. रानाडे प्रतिभा, झाँसी की रानी लक्ष्मी बी, अनुवाद-गोविन्द गुंठे, नेशनल बुक त्रस्त, इंडिया, २००८, पृष्ठ-१९ 
२९. तत्रैव, पृष्ठ-१९ 
३०.  तत्रैव, पृष्ठ-१५
३१. बेल चार्ल्स, म्युटिनी पार्ट-१, पृष्ठ-४०
३२.  सेन सुरेन्द्रनाथ, पूर्वोक्त, पृष्ठ-५
३३. रानाडे प्रतिभा, पूर्वोक्त, पृष्ठ-१८
३४.  सुन्दरलाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३०७
३५. गिरि राजीव रंजन, पूर्वोक्त, पृष्ठ-६९ 
३६.रानाडे प्रतिभा, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३५
३७.गिरि राजीव रंजन, पूर्वोक्त, पृष्ठ-७२
३८. गिरि राजीव रंजन, पूर्वोक्त, पृष्ठ-७२-७३
३९. सुन्दरलाल, पूर्वोक्त, पृष्ठ-३२१
४०. शुक्ल रामलखन(संपादित), पूर्वोक्त, पृष्ठ-२५० 
४१. तत्रैव, पृष्ठ-२५३
४२.  तत्रैव, पृष्ठ-२५४

मैं लगा था उनकी जिन्दगी सुलझाने में/
और मेरी जिन्दगी ही उलझती चली गई /
चाहा था कि हर मोड़ पर राह दिखला दूं/
मेरे साथ मेरी राह भी भटकती चली गई/

जय कुमार झाजी, अहां के धन्यवाद.....अगला शेर है- अच्छी लगती है उलझन भरी जिन्दगी/वो किसी के काम तो  आती चली गई


जोहार
खेल प्रेमियो!!!! 
स्वागत है
भारतीय ओलिम्पिक टीम के प्रथम कप्तान
जयपाल सिंह मुंडा
की पावन धरती पर




२.
खेलों  का मेला
खिलाडियों की जमघट!!!!!!!
स्वागत है
खेल के प्रेमियों का
खेल-खिलाडियों की धरती
झारखण्ड
३.
खिलाड़ियों का रेला
खेलों का मेला
खेल प्रेमियों का
हृदय से ज़ोहार
स्नेह के फूलों से  स्वागत
खेल के राष्ट्रीय महासंग्राम में 
३४वां राष्ट्रीय खेल २०११


खेल का महाकुम्भ:खेल प्रेमियों का रेला

स्वागत है
खिलाड़ियों का
खेल प्रेमियों का

खेल का महा संग्राम : खेल प्रेमियों का महा पर्व 
स्वागत है
खिलाड़ियों का
खेल प्रेमियों का

खेल का महा संग्राम: निमंत्रण आपको आने का
सुस्वागतम

सुस्वागतम
खेल में उमड़ता जोश: अदम्य उत्साह रोमांच

सुस्वागतम
आएं  देखें , खेलों में खो जाएँ
खिलाड़ियों में उत्साह जगाएँ   



रविवार, 30 जनवरी 2011

जेटली:झामुमो, आजसू और जदयू दूसरी कोटि के दुश्मन

















जिया जयदी  


 *दिलीप तेतरवे और जिया जयदी
झारखण्ड प्रदेश  भारतीय  जनता  पार्टी की कार्य समिति की बैठक में भाग लेने आए भाजपा के चाणक्य अरुण जेटली ने यहाँ के नेताओं को अपनी पार्टी के दो प्रकार के दुश्मनों के बारे में चेताया है. पहली  कोटि के दुश्मन हैं बाबूलाल मरांडी का विकास मोर्चा और कांग्रेस, ख़ास कर "सुबोध कांग्रेस." दूसरी  कोटि के दुश्मन हैं शिबू-हेमंत की पार्टी और  झामुमो ,"नीतीश समर्थक जदयू" और उपमुख्यमंत्री  सुदेश महतो का आजसू. भाजपा के इन दुश्मनों को गिनाते हुए अरुण जेटली ने कहा कि हमें बिहार वाली गलती दुहरा कर किसी भी सहयोगी पार्टी को ज्यादा मजबूत या क्षेत्र विस्तार नहीं करने देना है. उनके विचार में अगले चुनाव में झामुमो और आजसू क्षेत्र विस्तार कर भाजपा को दोयम दर्जे की पार्टी  बनाने की नीति रखते हैं. नीतीश के पर, अगर समय पर क़तर दिए गये होते तो आज वह हमें झंडा यात्रा का समर्थन करता दीखता और नरेंद्र मोदी को बिहार आने से नहीं रोकता. उसे तो शिव सेना से भारी चिढ़ है, लेकिन हम कभी शिव सेना को नहीं छोड़ सकते हैं. वह हमारी सभी नीतियों का समर्थन करती है, भले वह मुम्बई में हिंदी भाषियों पर लाठियां भांजती हो. मराठी भावना वहां की राजनीति का बड़ा फैक्टर  है और शिव सेना के साथ रहने पर यह फैक्टर हमारी पार्टी को मजबूत करता है.
           मतलब साफ़ है कि  अरुण जेटली बिहार वाली कहानी नहीं दुहराने के लिए सचेत हैं, जहाँ भाजपा, "नीतीश के जदयू" के सामने घुंटने टेक कर सत्ता में है. बिहार में भाजपा का जनाधार भी घटता जा रहा है और नीतीश तेजी से भाजपा प्रभाव  वाले क्षेत्र में पैर जमाते जा रहे हैं. अगर हम बिहार में अपनी नीति के साथ अब जोरदार ढंग से काम नहीं करेंगे तो भाजपा का वहां बंटाधार हो जाएगा. जब नीतीश नरेंद्र मोदी का विरोध करते हैं तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता है, भाजपा को हानि होती है. जेटली ने मुंडा को भी हिदायत दी कि वे बार-बार झारखण्ड को बिहार की लाइन पर विकसित करने की बात छोड़ कर गुजरात की तरह विकसित करने की बात करें. सहयोगी पार्टियों पर कठोर नियंत्रण रखें. ज्ञातव्य  है कि  हाल के दिनों  में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा अपने हर भाषण में झारखण्ड में बिहार का विकास माडल लागू करने की बात करते रहे हैं. यह बात जेटली को कतई पसंद नहीं आई है.
         अपने इस दौरे में जेटली ने झारखण्ड के उन सभी नेताओं को हाशिए पर ले जाने की भी नीति अपनाई जो उनके गुट के नहीं हैं. पूर्व झारखण्ड प्रदेश 
भाजपा के अध्यक्ष रघुवर दास को कार्य  समिति की बैठक के प्रचार हेतु बनाए गए पोस्टरों , होरडिंग और बैनरों  से गायब कर दिया गया. अपने आप को झारखण्ड का चाणक्य समझने वाले सरयू राय को भी हाशिए पर पहुंचा दिया गया. कड़ीया मुंडा को भी गुमनाम ही रखा गया. कड़िया मुंडा को हाशिए पर लाने की नीति के लिए अर्जुन मुंडा भी जिम्मेदार हैं और आने वाले दिनों में कड़िया-समर्थकों के खुले विरोध का उनको सामना करना पड़ सकता है. वैसे, उनके समर्थकों ने जेटली के सामने इस बाबत अपना विरोध रखा है , जिसे जेटली ने अनसुना कर दिया. शायद, जेटली यह भूल गए कि विगत लोक सभा चुनाव के समय   एक "टेंट हाउस वाले नेता ने" उनको  सात दिनों तक कोप भवन में जाने के लिए मजबूर कर दिया था. आश्चर्य है उसी  नेता ने  कड़िया मुंडा जैसे सुलझे और वरिष्ठ नेता को, झामुमो से भाजपा में आए अर्जुन मुंडा के सामने बौना करने का प्रयास किया है.  कड़िया  के निकटतम देवदास आपटे ने इस  मामले पर अपनी असहमति जाहिर कर दी है. उनका मानना है कि अगर झारखण्ड के गठन के समय  कड़िया  मुंडा को मुख्यमंत्री  बनाया जाता तो आज पूरे प्रदेश में भाजपा की जड़ें मजबूत होतीं. लेकिन पार्टी ने एक महात्वाकांक्षी नेता बाबुलाल मरांडी को मुख्यमंत्री बना दिया और इस निर्णय में भी अरुण जेटली का प्रभाव था. इस बैठक में यशवंत सिन्हा को भी गुमनाम कर दिया गया क्योंकि सिन्हा ने जेटली की नीतियों की खुली आलोचना की थी. अब भाजपा भी आतंरिक रूप से गुटबाजी का पूरी तरह से शिकार हो गयी है, यह साबित हो गया है.  
         रांची में संवाददाता सम्मलेन में भी अरुण जेटली कुछ प्रश्नों से भागने के लिए आतुर दिखे. उनके पास गणतंत्र दिवस पर साम्प्रदायिकता  भड़काने वाली झंडा यात्रा पर,  नीतीश और अकाली दल के विरोध के पर,  उनके पास बोलने के लिए शब्दों की कमी पड़ गई. वे बस इतना ही कह पाए, " हम हमारी नीति पर चलते हैं और वे अपने दल की नीति पर." जदयू के एक  वरिष्ठ नेता ने अपना नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा "भाजपा कश्मीर की कीमत पर केंद्र  में सत्ता चाहती है.वह अपने साथी दलों को भी रौंद देने  की नीति पर चल रही है, जो नहीं चलेगी.....विगत विधान सभा चुनाव में भी भाजपा की कोशिश थी कि वह झारखण्ड में जदयू को अलग कर चुनाव लड़े. उसने झामुमो  के साथ भी सरकार बनायी, जिसका नक्सलियों से सीधा सम्बन्ध  है. भाजपा ने कोड़ा के खिलाफ सीबीआई जांच की पहले मांग की और बाद में सीबीआई जाँच का विरोध किया और न्यायालय में भी लिख कर  दे दिया कि सीबीआई जाँच की जरूरत नहीं है.. भाजपा सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है." जदयू कोटे से मंत्री बने राजा पीटर ने भी हाल में ही बयान दे कर कहा कि मुंडा सरकार उनको जान से मरवा देना चाहती है और इसी लिए उनको सरकारी आवास नहीं दिया गया है  और सुरक्षा  में भी अन्य मंत्रियों की तुलना में कम पुलिस बल दिए गए हैं, जबकि वे नक्सल प्रभावित क्षेत्र से आते हैं. 
         झारखण्ड प्रदेश कार्य समिति की बैठक में वे ही नेता चहकते  रहे जो अरुण जेटली, मुंडा सरकार या अर्जुन मुंडा के गुडबुक में हैं, बाद बाक़ी को मन लिया गया कि वे भाजपा में हैं ही नहीं या उनका राजनीतिक वजूद समाप्तप्राय हो गया है.