रविवार, 30 जनवरी 2011

जेटली:झामुमो, आजसू और जदयू दूसरी कोटि के दुश्मन

















जिया जयदी  


 *दिलीप तेतरवे और जिया जयदी
झारखण्ड प्रदेश  भारतीय  जनता  पार्टी की कार्य समिति की बैठक में भाग लेने आए भाजपा के चाणक्य अरुण जेटली ने यहाँ के नेताओं को अपनी पार्टी के दो प्रकार के दुश्मनों के बारे में चेताया है. पहली  कोटि के दुश्मन हैं बाबूलाल मरांडी का विकास मोर्चा और कांग्रेस, ख़ास कर "सुबोध कांग्रेस." दूसरी  कोटि के दुश्मन हैं शिबू-हेमंत की पार्टी और  झामुमो ,"नीतीश समर्थक जदयू" और उपमुख्यमंत्री  सुदेश महतो का आजसू. भाजपा के इन दुश्मनों को गिनाते हुए अरुण जेटली ने कहा कि हमें बिहार वाली गलती दुहरा कर किसी भी सहयोगी पार्टी को ज्यादा मजबूत या क्षेत्र विस्तार नहीं करने देना है. उनके विचार में अगले चुनाव में झामुमो और आजसू क्षेत्र विस्तार कर भाजपा को दोयम दर्जे की पार्टी  बनाने की नीति रखते हैं. नीतीश के पर, अगर समय पर क़तर दिए गये होते तो आज वह हमें झंडा यात्रा का समर्थन करता दीखता और नरेंद्र मोदी को बिहार आने से नहीं रोकता. उसे तो शिव सेना से भारी चिढ़ है, लेकिन हम कभी शिव सेना को नहीं छोड़ सकते हैं. वह हमारी सभी नीतियों का समर्थन करती है, भले वह मुम्बई में हिंदी भाषियों पर लाठियां भांजती हो. मराठी भावना वहां की राजनीति का बड़ा फैक्टर  है और शिव सेना के साथ रहने पर यह फैक्टर हमारी पार्टी को मजबूत करता है.
           मतलब साफ़ है कि  अरुण जेटली बिहार वाली कहानी नहीं दुहराने के लिए सचेत हैं, जहाँ भाजपा, "नीतीश के जदयू" के सामने घुंटने टेक कर सत्ता में है. बिहार में भाजपा का जनाधार भी घटता जा रहा है और नीतीश तेजी से भाजपा प्रभाव  वाले क्षेत्र में पैर जमाते जा रहे हैं. अगर हम बिहार में अपनी नीति के साथ अब जोरदार ढंग से काम नहीं करेंगे तो भाजपा का वहां बंटाधार हो जाएगा. जब नीतीश नरेंद्र मोदी का विरोध करते हैं तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता है, भाजपा को हानि होती है. जेटली ने मुंडा को भी हिदायत दी कि वे बार-बार झारखण्ड को बिहार की लाइन पर विकसित करने की बात छोड़ कर गुजरात की तरह विकसित करने की बात करें. सहयोगी पार्टियों पर कठोर नियंत्रण रखें. ज्ञातव्य  है कि  हाल के दिनों  में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा अपने हर भाषण में झारखण्ड में बिहार का विकास माडल लागू करने की बात करते रहे हैं. यह बात जेटली को कतई पसंद नहीं आई है.
         अपने इस दौरे में जेटली ने झारखण्ड के उन सभी नेताओं को हाशिए पर ले जाने की भी नीति अपनाई जो उनके गुट के नहीं हैं. पूर्व झारखण्ड प्रदेश 
भाजपा के अध्यक्ष रघुवर दास को कार्य  समिति की बैठक के प्रचार हेतु बनाए गए पोस्टरों , होरडिंग और बैनरों  से गायब कर दिया गया. अपने आप को झारखण्ड का चाणक्य समझने वाले सरयू राय को भी हाशिए पर पहुंचा दिया गया. कड़ीया मुंडा को भी गुमनाम ही रखा गया. कड़िया मुंडा को हाशिए पर लाने की नीति के लिए अर्जुन मुंडा भी जिम्मेदार हैं और आने वाले दिनों में कड़िया-समर्थकों के खुले विरोध का उनको सामना करना पड़ सकता है. वैसे, उनके समर्थकों ने जेटली के सामने इस बाबत अपना विरोध रखा है , जिसे जेटली ने अनसुना कर दिया. शायद, जेटली यह भूल गए कि विगत लोक सभा चुनाव के समय   एक "टेंट हाउस वाले नेता ने" उनको  सात दिनों तक कोप भवन में जाने के लिए मजबूर कर दिया था. आश्चर्य है उसी  नेता ने  कड़िया मुंडा जैसे सुलझे और वरिष्ठ नेता को, झामुमो से भाजपा में आए अर्जुन मुंडा के सामने बौना करने का प्रयास किया है.  कड़िया  के निकटतम देवदास आपटे ने इस  मामले पर अपनी असहमति जाहिर कर दी है. उनका मानना है कि अगर झारखण्ड के गठन के समय  कड़िया  मुंडा को मुख्यमंत्री  बनाया जाता तो आज पूरे प्रदेश में भाजपा की जड़ें मजबूत होतीं. लेकिन पार्टी ने एक महात्वाकांक्षी नेता बाबुलाल मरांडी को मुख्यमंत्री बना दिया और इस निर्णय में भी अरुण जेटली का प्रभाव था. इस बैठक में यशवंत सिन्हा को भी गुमनाम कर दिया गया क्योंकि सिन्हा ने जेटली की नीतियों की खुली आलोचना की थी. अब भाजपा भी आतंरिक रूप से गुटबाजी का पूरी तरह से शिकार हो गयी है, यह साबित हो गया है.  
         रांची में संवाददाता सम्मलेन में भी अरुण जेटली कुछ प्रश्नों से भागने के लिए आतुर दिखे. उनके पास गणतंत्र दिवस पर साम्प्रदायिकता  भड़काने वाली झंडा यात्रा पर,  नीतीश और अकाली दल के विरोध के पर,  उनके पास बोलने के लिए शब्दों की कमी पड़ गई. वे बस इतना ही कह पाए, " हम हमारी नीति पर चलते हैं और वे अपने दल की नीति पर." जदयू के एक  वरिष्ठ नेता ने अपना नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा "भाजपा कश्मीर की कीमत पर केंद्र  में सत्ता चाहती है.वह अपने साथी दलों को भी रौंद देने  की नीति पर चल रही है, जो नहीं चलेगी.....विगत विधान सभा चुनाव में भी भाजपा की कोशिश थी कि वह झारखण्ड में जदयू को अलग कर चुनाव लड़े. उसने झामुमो  के साथ भी सरकार बनायी, जिसका नक्सलियों से सीधा सम्बन्ध  है. भाजपा ने कोड़ा के खिलाफ सीबीआई जांच की पहले मांग की और बाद में सीबीआई जाँच का विरोध किया और न्यायालय में भी लिख कर  दे दिया कि सीबीआई जाँच की जरूरत नहीं है.. भाजपा सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है." जदयू कोटे से मंत्री बने राजा पीटर ने भी हाल में ही बयान दे कर कहा कि मुंडा सरकार उनको जान से मरवा देना चाहती है और इसी लिए उनको सरकारी आवास नहीं दिया गया है  और सुरक्षा  में भी अन्य मंत्रियों की तुलना में कम पुलिस बल दिए गए हैं, जबकि वे नक्सल प्रभावित क्षेत्र से आते हैं. 
         झारखण्ड प्रदेश कार्य समिति की बैठक में वे ही नेता चहकते  रहे जो अरुण जेटली, मुंडा सरकार या अर्जुन मुंडा के गुडबुक में हैं, बाद बाक़ी को मन लिया गया कि वे भाजपा में हैं ही नहीं या उनका राजनीतिक वजूद समाप्तप्राय हो गया है.    
  

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